Wednesday, February 3, 2010
आइना ऑफ़ समाज
दूसरो के जलते घरो को बना लेते हैं अलाब अपना ,महसूस भी नहीं करते हैं उसकी तपन को ,अपनों की परबह किसे ,देखते हैं दूसरो की जिन्दगी मैं ,कहीं तो मौका मिलेगा ,उनके मखोल को
Friday, January 22, 2010
2 or 4 ka antar
is par do line kehne ka man karta hain ki
' bhaag rahe hain log bus duniya ki bheed main ,aur shaam ko gala gila kar rahe hain gam ke naam ka , ye jeena bhi kya jeena hain dosto ye jeena to hain bus naam ka '
bus ek competition ko nahi dekh paaye ,do aur char ka competition ,hamara aur jaanwaro ka competition ,competition barabar chal raha hain ,hor barabar lagi hui hain ,koi antar hi nahi rah gya hain ab ,humme aur janwaro main ,kabhi gaur kiya hain humme aur unme kya antar hain ,to hum kehte hain dimaag ka ,are dosto ye antar nahi hain ,dimaag to tumse bhi jyada hain unme ,antar hain ghum do par chalte hain ,aur bo char par chalte hain ,iske alawa koi anra nahi reh gya hain ab,hum kama kar kha raahe ,to vo bhi kama kar kah rahe hain ,pura competition mil raha hain,koi bhi dainik kaam dekh lo barabar competition mil raha hain,vo behssi ,darindgi phaila rahe hain ,to yahan par hum log 20 hi saabit ho rahe hain ,ab main dimaag ki defination nahi samaj paa raha hu ,ki dimaag ka kaam kya hain ,apne tuch budghi se mujhe lagta hain ,ki hum jo kar rahe hain bo sahi hain ya galat ,ya hume is kaam ko karna chahiye ya nahi ,ye sab baate hamara dimaaag hume batata hain,ab aap log bataye ,ki hum main auir janwaro main kya pure competition nahi hain ,apne bacche hum paaal rahe hain ,to janwar kya maar dete hain ,vo bhi aopne baccho ko palte hain ,doosro ke baccho ko hum aage nahi badhne dena chahte hain ,yahi janwar karte hain ,to ab hummme aur janwaro main antar dimaga ka nahi
do aur char ka reh gya hain
ab jaise vichar man main aaye ,baisa hi likh diya hain ,log kehte hain jaato ki buddhi ghuttno main hoti hain,kyoki bo bolne se pahle sochte nahi hain ,lekin phir us baat ka fayda hi kya hoga ,jo baat hum badal kar bol denge ,log kehte hain first impression in last ,to jo perception dimaag main hain ,bo bol diya ,to kya galat kiya
kyon ji baat sahi keh raha hu ya galat ,bina soche jabab dena ,jo bhin man main aaye bo hi likh dena chahhe vo kitna hi galat ya sahi ho
Friday, August 7, 2009
hamara middle class
Saturday, June 20, 2009
हमारा स्वार्थ
जब श्री राम चंद्र जी श्रीलंका ,सीता माता लेने जा रहे थे,तब समंदर पर आकर उनका काफिला रुक गया क्योकि वहां से आगे जाने का रास्ता नही था ,
तब उन्होंने वहां पर भगवन शिव की आराधना की,उन्होंने वहीँ पर शिव जी की आराधना क्यों की , कुओकी भगवन शिव ही उन्हें आगे का मार्ग दर्शन दे सकते थे
इसलिए मुझे लगा ,राम चंद्र जी श्री लंका जाने के लिए शिव जी की मदद चाहते थे थे
इसलिए ,वहां पर रामजी का स्वार्थ था,तो उन्होंने उनकी आराधना की ,इसलिए स्वार्थ करना भी जरूरी हैं,जब इसकी जरूरत हो
क्योकि व्यक्ति भगवन के पास तभी जाता हैं ,जब उसे किसी चीज की जरूरत हो ,सभी व्यक्ति अपने अपने स्वार्थ कि लिए ही मन्दिर, मस्जिद ,गुरु द्वारा , चर्च जाते हैं ,
सो अगर स्वार्थ होना भी जरूरी हैं, आगरा स्वार्थ नहो होगा ,तो व्यक्ति भगवन को भूल जायगा
और जब व्यक्ति , अपने पिता पर्मशवर को ही भूल जाएगा , .........................................
अब इससे आगे मैं क्या कहूँ
कृपया इस लेख पर अपने विचार अवस्य दे
ब्रज दीप (अभय)
Saturday, June 13, 2009
जीवन और उसके कुछ पहलु
यहाँ आपको सभी भोतिक सुख मिल जायेंगे,बस कभी अपने आप से मत पूछना के मुझे कितना और चाहिए जिससे मैं संतुष्ट हो जाओं ,क्योंकि इस वन को आज तक कोई पुरा नही कर पाया हैं ! तुम एक जगह भर दोगे ,तो कोई दूसरी जगह खाली हो जायेगी ,सो जैसा चलता हैं चलने दो ,मेरे एक दोस्त ने कहा हैं ,'हम सबको पता हैं हम उपर कुछ भी लेकर नही जा सकते हैं ,तब इतनी मारा मारी हैं , अगर उपर कुछ सामान ले जाने का सिस्टम होता तब यहाँ पर क्या होता '
कभी कभी लगता हैं ,भगवन ने एक अलग कोम बनाई थी इंसान ,की ये जानवरों से कुछ अलग होगा ,पर हम तो जानवरों को भी पीछे छोड़ने की तयारी मैं लगे हुए हैं ,मैं जानवरों और इंसान मैं विभिन्ताये देख रहा था ,मगर मुझे विभिंता नज़र नही आई ,आज के जीवन मैं इंसान केवल आपने बारे मैं सोचता हैं ,पहले अपना पेट भरने की कोसिस करता हैं ,अपनी जरुरत को पुरा करने की कोशिश करता हैं ,अपनी वासनाओ को शांत करता हैं
अब आप जानवरों के बारे मैं सोचे ! अगर कोई विभिंता आपको नज़र आए तो मुझे जरूर बताना ,तो फिर क्या अन्तेर रह गया जानवर और इन्सान मैं
हिंदू धर्मानुसार - हमारे यहाँ देवता तथा राक्षसः होते हैं
देवता सही कर्मो के लिए जाने जाते हैं तथा राक्षसः बुरे कार्यो के लिए ,हमारे अंदर ये दोनों होते हैं ,ये हमारी इच्छा सकती पर निर्भर करता हैं !की हम किसको प्रकट कर रहे हैं या हम किसको हाबी कर रहे हैं आपने उपर
मेरा कहने का तात्पर्य ये हैं की ,अगर हमे मनुस्य बनाया गया हैं तो जरूर किसी न किसी उदेस्सय के लिए ही बनाया गया हैं ,तो क्यों अपना जीवन दूसरे के सुख देख के दुखी होकर ख़राब कर रहे हो ,अपने अंदर के देवता को बहार निकालो ,और इस योनी मैं बता दो के हम ने वो कर दिया जो एक इंसान को कर दिया
कुछ लोगो ने अपने अंदर के देवता को बहार निकला ,और आज वो अमर हो गये,तो क्या हम साड़ी उमर उनके किस्से ही सुनते रहेंगे ,कुछ ऐसा करो के लोग तुम्हारे किस्से भी सुने ,तुम्हारे परिवार वाले ,तुम्हारे घरवाले गर्व के साथ कह सके की ये मेरा बेटा हैं ,की ये मेरा भांजा हैं ,की ये मेरा दोस्त हैं ,इसका मतलब ये बिल्कुल नही होता हैं की हम अगर एक डॉक्टर बन गये या एक इंजिनियर बन गये या कुछ भी बन गये जीविका चलने के लिए ,तो हमारा जीवन सफल हो गया !
अगर हम इस जीवन मैं एक अच्छे इन्सान न बन सके,तो डॉक्टर और इंजिनियर बन्ने का कोई फायदा नही अरे अपने आप को संतुष्ट तो जानवर भी करते हैं ,कभी दूओस्रो को संतुष्ट करके देखो जीवन मैं कितना आनद आता हैं
इतना आनंद five star मैं खाना खा ke नही आता हैं ,इतना आनंद आराम दायक बिस्तर मैं नही आता हैं, जितना आनंद दूसरो के काम करने मैं आता हैं । उनकी दुआ चीनी से भी मिट्ठी होती हैं
अपने लिए तो दुनिया करती हैं ,कभी दूसरो के लिए भी करके देखो ,जिंदगी जीने का मज़ा आ जाएगा !
Monday, June 8, 2009
ब्यंग
शादी से पहले मैं बेरोजगार था ,आज भी बेरोजगार हु ,फर्क बस इतना हैं पहले कवि था,आज कहानी कर हु ,कवि से कहानी कार बन्ने की भी एक कहानी हैं ,बात शादी से पहले की हैं थोद्दी पुराणी हें ,पहले मैं श्रंगार की कविता लिखता था, सकल सूरत से गीतकारदीखता था ,पर सदीके बाद जब श्री मति जी हमारे घर आई ,मेरे श्रंगारिक रूप को बहुत दिनों तक बर्दास्त नही केर पायी ,एक रात जब मैं कवि सम्मेलन से घर aaya , आब न देखा ताब झगड़ गयी ,
मैंने कहा प्रिया मेरे गीत हें तुम्हारे लिए , बे बोली देखो मुझे बेबकूफ मत बनाओ , सही सही बताओ जब मैं नही थी ,तो किसके लिए आहें भरा कर्त्ते थे , मैंने कहा प्रिया पहले मैं तुम्हारी कल्पना मैं गीत लिखता था अब तुम्हारे प्यार मैं गीत लिखता हूँ, फिर भी तुमको दौब्त फुल दीखता हू ,पर उन्हें मेरी बात samajh मैं नही आई, और और वो नाराज़ होके मायके चली गयी ,वहीँ से चिट्ठी भिजवाई ,गीत लिखना छोड़ दोगे ,तो वापिस ससुराल औंगी वरना साडी उमर मायके मैं बितौंगी ,
लाइफ को खतरे मैं जानकर बीबी की बात मानकर मैं हास्य लिखना सुरु केर दिया ,पर जल्द ही इसका परिणाम भी भुगत लिया , एक कवि सम्मलेन मैं मैं नेता जी पर एक हास्य रचना सुनायी रचना पब्लिक को तो बहुत पसंद आई पैर नेताजी को बिल्कुल नही भाई , रचना की समाप्ति पर , पब्लिक तालियाँ पीट रही थी , और नेताजी मुझे ,
मैं एक हफ्ते अस्पताल मैं रहा , उसके बाद मैंने किसी नेता के बारे मैं कुछ नही कहा ,अगले कवि सम्मलेन मैं मैंने एक पुलिस पैर हास्य रचना सुना दी ,तो एक दरोगा जी ने हमको अपनी पॉवर दिखा दी ,उनकी लाठी को आ गया जोश , मैं तीन दिन तक रहा बेहोश ,छूते दिन मैंने अपने आप को जेल के अंदर पाया किसी तरेह जमानत कराकर घर वापिस आया ,वे बोली पता नही कविता कैसी सुनते हो, मर्द होकर भी पिट जाते हो,
उनकी बातो से मेरा पुरुस जग गया,मैं वीर रस की कविता लिखने लग गया ,बहार से कवि सम्मलेन मैं जब मैंने वीर रस का एक गीत सुनाया उस्सका भी ग़लत परिणाम ही सामने आया ,मेरे ओजस्वी विचारो से लोगो के मन मैं जोश भर गया ,और वहां की व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ गया , लोगो ने अपना आक्रोश वहां खड़े एक आधी करी पर उतरा ,इस बात को लेकर आयाज्को ने मुझे बहुत मारा , मैं बहुत चीखा चिल्लाया ,किसी तरह लंगडाते हुए घर वापिस आया
मैंने फटापट उन्हें हाल सुनाया ,बे फिर बोली तुमने फिर गच्चा खाया ,मैंने कहा प्रिया कविता लिखना सरल हें ,पर सुनना बहुत कठिन हें, और अगर सुना दो, तो घर सही सलामत आना कठिन हें
ब्रज दीप सिंह (अभय)