महल कि चारदीवारी मैं अपना तो दम घुटता हैं
आ गये थे लोगो के बहकाबे मैं इन दीवारो के भीतर
फिर से खुली हवा मैं जाना अब सपना लगता है
शादी से पहले मैं बेरोजगार था ,आज भी बेरोजगार हु ,फर्क बस इतना हैं पहले कवि था,आज कहानी कर हु ,कवि से कहानी कार बन्ने की भी एक कहानी हैं ,बात शादी से पहले की हैं थोद्दी पुराणी हें ,पहले मैं श्रंगार की कविता लिखता था, सकल सूरत से गीतकारदीखता था ,पर सदीके बाद जब श्री मति जी हमारे घर आई ,मेरे श्रंगारिक रूप को बहुत दिनों तक बर्दास्त नही केर पायी ,एक रात जब मैं कवि सम्मेलन से घर aaya , आब न देखा ताब झगड़ गयी ,
मैंने कहा प्रिया मेरे गीत हें तुम्हारे लिए , बे बोली देखो मुझे बेबकूफ मत बनाओ , सही सही बताओ जब मैं नही थी ,तो किसके लिए आहें भरा कर्त्ते थे , मैंने कहा प्रिया पहले मैं तुम्हारी कल्पना मैं गीत लिखता था अब तुम्हारे प्यार मैं गीत लिखता हूँ, फिर भी तुमको दौब्त फुल दीखता हू ,पर उन्हें मेरी बात samajh मैं नही आई, और और वो नाराज़ होके मायके चली गयी ,वहीँ से चिट्ठी भिजवाई ,गीत लिखना छोड़ दोगे ,तो वापिस ससुराल औंगी वरना साडी उमर मायके मैं बितौंगी ,
लाइफ को खतरे मैं जानकर बीबी की बात मानकर मैं हास्य लिखना सुरु केर दिया ,पर जल्द ही इसका परिणाम भी भुगत लिया , एक कवि सम्मलेन मैं मैं नेता जी पर एक हास्य रचना सुनायी रचना पब्लिक को तो बहुत पसंद आई पैर नेताजी को बिल्कुल नही भाई , रचना की समाप्ति पर , पब्लिक तालियाँ पीट रही थी , और नेताजी मुझे ,
मैं एक हफ्ते अस्पताल मैं रहा , उसके बाद मैंने किसी नेता के बारे मैं कुछ नही कहा ,अगले कवि सम्मलेन मैं मैंने एक पुलिस पैर हास्य रचना सुना दी ,तो एक दरोगा जी ने हमको अपनी पॉवर दिखा दी ,उनकी लाठी को आ गया जोश , मैं तीन दिन तक रहा बेहोश ,छूते दिन मैंने अपने आप को जेल के अंदर पाया किसी तरेह जमानत कराकर घर वापिस आया ,वे बोली पता नही कविता कैसी सुनते हो, मर्द होकर भी पिट जाते हो,
उनकी बातो से मेरा पुरुस जग गया,मैं वीर रस की कविता लिखने लग गया ,बहार से कवि सम्मलेन मैं जब मैंने वीर रस का एक गीत सुनाया उस्सका भी ग़लत परिणाम ही सामने आया ,मेरे ओजस्वी विचारो से लोगो के मन मैं जोश भर गया ,और वहां की व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ गया , लोगो ने अपना आक्रोश वहां खड़े एक आधी करी पर उतरा ,इस बात को लेकर आयाज्को ने मुझे बहुत मारा , मैं बहुत चीखा चिल्लाया ,किसी तरह लंगडाते हुए घर वापिस आया
मैंने फटापट उन्हें हाल सुनाया ,बे फिर बोली तुमने फिर गच्चा खाया ,मैंने कहा प्रिया कविता लिखना सरल हें ,पर सुनना बहुत कठिन हें, और अगर सुना दो, तो घर सही सलामत आना कठिन हें
ब्रज दीप सिंह (अभय)
शरारत न होती शिकायत न होती ,ख्यालो मैं किसी की नजाकत न होती
न होती बेकरारी न होते हम तनहा ,जो जहाँ मैं कम्बखत ये मोहब्बत न होती
न होते ये सपने ये खुअबो के दुनिया किसी की चाहत की तम्मना न होती
नa जुल्फों की छाया न फूलों की kहुसबू यादो मैं उनकी राते न कटती
जो न होती मोहब्बत ये आंशूं न होते , दिल भी न खोता आज तनहा न रोता
मजनू सी अपनी ये हालत न होती ,जो न होती मोहब्बत ये आंशु न होते दिल भी न खोता आज तनहा न रोता
चाँद अगर औरो पे मरेगा क्या करेगी चांदनी ,प्यार मैं पंगा करेगा क्या करेगा चांदनी
लाख तुम फासले उगा लो एकता की देश मैं ,इसको जब नेता चरेगा क्या करेगी चांदनी
जो बचा था खून उसको तो सियासत पि गयी ,खुदकुशी खटमल करेगा क्या करेगी चांदनी
चाँद से हैं खुबसूरत भूक मैं दो रोटियाँ ,भूखा कोई बच्चा मरेगा क्या करेगी चांदनी
बनते हैं दोस्त हजारो ,पर निभाता हैं कोई कोई,
आँखों को अच्छे लगते हैं बहुत,पैर दिल को बता हैं कोई कोंई
मिलते हैं बहुत लोगो से दिन के उजाले मैं हम
पर रातो को सपनो मैं आता हैं कोंई कोई
कहने को तो बेशुमार हैं अपने इस दुनिया मैं
हकीकत हैं मगर अपना हो पता हैं कोंई कोंई
किसी का प्यार मिले या न मिले ये मेरी तकदीर पर हैं
खुदा की बंदगी करते हैं लाखो पर खुदा को पता हैं कोंई कोंई
tu hi meri kamna mere geet ho
mera jeevan savara tum bo preet ho
main ab tak akela tha arthheen tha, jeevan jeevan nahi shok geet tha
tum veena ke taro ka bo sangeet ho,tum meri kamna mera sangeet ho
kisi anjane path per main chalta raha, main her pal mera main jalta raha
man ki agan bujai tum bo sheet ho,tum meri kamna mera sangeet ho
sakdo bandhno main tha main lipta hua, apne akakipan main tha simta hua
mere bandhan tudaye tum bo reet ho,tum meri kamna mera sangeet ho
mere sang sang chalo bhar ke man main umang,ant tak na chute hamara ye sang
unmat rahoon tum ko gata chalo, arthpurn prem ka tum vo geet ho
tum hi meri kamna mera sangeet ho